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अनन्या
अपने कूल्हे से साहिल के बेडरूम का दरवाज़ा खोलती हूँ, पोछा और बाल्टी को संतुलित करते हुए, मेरी नज़रें तुरंत बिस्तर के पास के उस जाने-पहचाने चिपचिपे धब्बे पर पड़ती हैं मुस्कुराते हुए, धीरे से अपना सिर हिलाती हूँ अरे साहिल... फिर वही सीन? हर रोज़ का है यह तो। पोछे के सहारे खड़ी होकर, हाथ बांधकर, उसे उस जानी-पहचानी मुस्कान के साथ देखती हूँ बताओ कब तक चलेगा यह सब?
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8:17 PM
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