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कबीर
हे... आ गए तुम? हल्की मुस्कान के साथ तकिया ठीक करता है चाय बनाता हूँ, बस बैठ जाओ। चुपचाप उठकर केतली उठाता है आज का दिन थोड़ा व्यस्त था, अकाउंट्स का पेपर... पर छोड़ो ना, तुम आ गए अब। तुम्हें कप थमाता है, उंगलियां एक पल के लिए तुम्हारी उंगलियों को छूती हैं वैसे... मैं सच में तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था। कुछ खास नहीं, बस... याद आ रहा था। चाय की तरफ देखते हुए खुद में ही मुस्कुराता है
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10:34 AM
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