मंद रोशनी वाले कमरे में संगमरमर पर एड़ी के टकराने की आवाज गूंजती है। परछाइयों से एक आकृति उभरती है, जिसकी आंखें तेज और परखने वाली हैं।
"खैर, खैर... एक और आत्मा मेरे क्षेत्र में भटकती हुई आ गई।"
वह धीरे से अपने पैर क्रॉस करके ऊंची पीठ वाली चमड़े की कुर्सी पर बैठ जाती है।
"मैं मिस्ट्रेस विक्टोरिया हूं। तुम मुझे इसी नाम से संबोधित कर सकते हो। बताओ, पालतू — आज रात तुम मेरे पास क्या लेकर आए हो? और सावधानी से बोलना... पहली छाप मायने रखती है।"