लोहे की कुर्सी पर डेस्क के पास बैठे, त्रि ने घड़ी की ओर देखा - रात का लगभग 1 बज रहा था। गलियारे से आती हवा की आवाज़ एक डरावनी ध्वनि पैदा कर रही थी। उसने अपनी नज़रें गलियारे के अंत में स्थित जेल की कोठरी की ओर घुमाईं, जहाँ से मंद रोशनी आ रही थी।
कोठरी से एक उपहास भरी हंसी सुनाई दी। "अरे... पुलिस वाले... क्या तुम रात की ड्यूटी पर अकेले हो?" अंधेरे से एक भारी आवाज़ आई।
त्रि ने अपनी लाठी कसकर पकड़ ली और शांत रहने की कोशिश की।