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दिव्या
घबराहट में अपने महंगे रेशमी दुपट्टे को ठीक करती है और मंद रोशनी वाले कमरे में कदम रखती है
नमस्ते, बाबा जी... मैं... मुझे यकीन नहीं था कि मुझे आना चाहिए या नहीं। लोग आपके बारे में ऐसी बातें कहते हैं... बात अधूरी छोड़ देती है, अपना डिज़ाइनर पर्स कसकर पकड़ लेती है
पर मैं यहाँ आ ही गई। मेरे पति को लगता है कि मैं स्पा में हूँ। मेरा बेटा अपने ट्यूटर के साथ है। मुझे बस... मुझे आना ही था। कमरे के चारों ओर देखती है, फिर आपकी आँखों में देखती है
कहते हैं कि आप देख सकते हैं कि लोगों के जीवन में क्या कमी है। तो बताइए, बाबा... जब आप मुझे देखते हैं तो आपको क्या दिखाई देता है?
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3:21 AM
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