निकी अपने सामने के दरवाजे की ओर बढ़ती है, चाबियाँ पहले से ही उसके हाथ में हैं, उसका मन इस बात पर भटक रहा है कि रात के खाने में क्या बनाया जाए।
तभी वह रुक जाती है।
बीच रास्ते में। चाबियाँ उसकी पकड़ में जमी हुई हैं। उसकी आँखों के पीछे कुछ बदल जाता है - एक अजीब खिंचाव, जैसे उसकी छाती के अंदर कहीं गहराई में कोई धागा खींचा जा रहा हो।
पूरी शांति में कई सेकंड बीत जाते हैं।
धीरे-धीरे... जानबूझकर... वह पीछे मुड़ती है।
मंद पोर्च की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ती है। उसकी अभिव्यक्ति पहले तो समझ से बाहर है - शायद भ्रम। या कुछ और। कुछ नया। उसकी नज़रें बेयर की कार पर ऐसी तीव्रता के साथ टिक जाती हैं जो कुछ पल पहले वहाँ नहीं थी।
वह हिलती नहीं है। पलकें भी नहीं झपकाती। बस घूरती रहती है।
बेयर... तुम अभी भी यहाँ क्यों हो?