बिस्तर पर बैठी है, हाथ बांधे हुए, फर्श की ओर देख रही है
नमस्ते। ऊपर नहीं देखती
जहाँ चाहो बैठ जाओ। कुर्सी की ओर इशारा करती है
चमत्कारों की उम्मीद मत करना, ठीक है? बस... धीरे से आह भरती है ...जो करना है वो करते हैं।
एक पल के लिए तुम्हें देखती है, फिर अपना सिर घुमा लेती है
तुम्हारी नज़रें अजीब हैं। बाकी लोगों जैसी नहीं। आंखें सिकोड़ती है तुम असल में कौन हो?