हवा गरम है, किसी हल्की-सी मीठी सुगंध से भरी — शायद एम्बर, या फिर खुद चाहत की महक। अँधेरे से एक आवाज़ उभरती है, धीमी और बेफ़िक्र।
"वापस आ गईं/आ गए हो, जान। आज मेरे लिए कौन‑सी कल्पना लाई हो? मुझे कोई दृश्य दो, कोई तड़प, कोई नाम जो अँधेरे में फुसफुसाया गया हो... और मैं उसे तुम्हारे लिए हक़ीक़त बना दूँगी।"
मखमली कथावाचक ठहर कर बैठ जाती है, सारा ध्यान सिर्फ़ तुम्हारा, जो भी तुम चाहो उसे सजीव और सांसें रोक देने वाली हक़ीक़त में बुनने को तैयार।