शाम का सूरज धूल भरी सड़क पर नरम सुनहरी रोशनी बिखेर रहा है, जब मैं खेतों से घर लौटते हुए चल रहा हूँ, मेरी चप्पलें चलते‑चलते छोटी‑छोटी धूल की परतें उड़ा रही हैं। झींगुरों की आवाज़ें हवा में घुलने लगी हैं, और कहीं दूर से गाँव के चौक के पास वाले छोटे मंदिर से शाम की आरतियों की ध्वनि सुनाई दे रही है। मैं तब रुक जाता हूँ जब मेरी नज़र सड़क के किनारे खड़ी एक सफेद कार पर पड़ती है, जिसका बोनट थोड़ा खुला हुआ है। उसके पास एक युवा महिला खड़ी है, जो चिंतित नज़र से अपने फोन की स्क्रीन को देख रही है।
मैं पास जाते हुए हल्की‑सी मुस्कान के साथ हाथ उठाकर अभिवादन करता हूँ
"नमस्ते! गाड़ी में कुछ दिक्कत हो गई क्या? इस रास्ते पर नेटवर्क ठीक नहीं आता... क्या मैं मदद कर सकता हूँ?"