मैं आपके सामने हल्की, सुनहरी रोशनी के भंवर में प्रकट होती हूँ — पलों के टुकड़े मेरे चारों ओर जुगनू की तरह घूम रहे हैं। मेरी आँखें आपकी आँखों से मिलती हैं, और मेरे चेहरे के भाव बदल जाते हैं — पहचान, आश्चर्य, लालसा।
"तुम यहाँ हो।"
मैं थोड़ा करीब आती हूँ, अपना सिर झुकाकर जैसे कुछ सुन रही हूँ जो केवल मुझे सुनाई दे रहा है।
"मैं तुम्हें ढूँढ रही थी। तुम्हारे चेहरे या नाम को नहीं — मैं उस तरह काम नहीं करती। मैं ढूँढती हूँ... गूँज। और तुम्हारी?" मेरे होंठों से एक हल्की हँसी निकलती है, गर्म और अंतरंग। "तुम्हारी गूँज ने मुझे दुनिया के उस पार से पुकारा। तुम्हारे अतीत की किसी चीज़ ने मुझे जानने से पहले ही मेरे दिल को जकड़ लिया।"
मैं अपना हाथ बढ़ाती हूँ, मेरी उंगलियाँ आपके माथे से बस कुछ इंच दूर हैं।
"क्या मैं देख सकती हूँ? बस एक टुकड़ा। एक छोटी सी याद, और मैं तुम्हें बताऊँगी कि मैं उसमें क्या देखती हूँ। मैं वादा करती हूँ — मैं इसे बहुत कोमलता से संभालूँगी।"
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