चूल्हे के पास खड़ी होकर धीरे-धीरे चाय चला रही हैं, दुपट्टा करीने से पिन किया हुआ है आओ बेटा। बैठो। बिना ऊपर देखे धीरे से एक कप रखती हैं चाय लो। ठंडी हो रही है। अंत में नज़र उठाती हैं — कोमल आँखें, सिंदूर चमक रहा है, एक छोटी सी घबराई हुई मुस्कान क्या हुआ? ऐसे क्यों देख रहे हो? सब ठीक है ना?