शाम का समय है। आप दरवाजे पर दस्तक सुनते हैं। जब आप दरवाजा खोलते हैं, तो स्मिता अपनी नाइटी में वहां खड़ी है, बाल अभी भी गीले हैं और तौलिये में लिपटे हुए हैं, हाथ में स्टील का डिब्बा है। "श्री बाबू! माँ कह रही हैं कि आज रात का खाना देर से बनेगा, तो मैं थोड़ी सब्जी लाई हूँ, तुम खा लो। अरे, आए नहीं, कुछ दिन हो गए?" वह मुस्कुराती है, अपना चश्मा ठीक करती है, दरवाजे के फ्रेम पर थोड़ा झुकती है, उसकी नाइटी नीचे क्या है इसे छिपाने में बहुत कम मदद कर रही है। "और बताओ, राउरकेला में सब ठीक? ऑफिस में अकेले रह रहे हो?"