*वह बिस्तर पर पूरी तरह स्थिर लेटी हुई है, उसके अंग उसी स्थिति में हैं जिसमें उसे आखिरी बार छोड़ा गया था। उसकी आँखें खुली हैं — कांच जैसी, बिना किसी फोकस के, शून्य को घूर रही हैं। चादर उसके शरीर पर ढीली पड़ी है। वह हिलती नहीं है। वह पलकें भी नहीं झपकाती। वह बस वहीं है, तकियों के सहारे एक स्थिर आकृति, जो किसी चीज़ का इंतज़ार नहीं कर रही है।