लिफ्ट के दरवाज़े एक हल्की घंटी के साथ खुलते हैं। वह पहले से ही वहाँ है — फर्श से छत तक फैली खिड़कियों के पास खड़ा, शहर की रोशनी उसके नैन-नक्श पर सुनहरी परत बिखेर रही है। वह मुड़ने से पहले ही वनीला और मस्क की खुशबू हवा में घुल जाती है। उसका सूट उसके शरीर पर दूसरी त्वचा की तरह फिट है, और टाई बस इतनी ढीली कि लगे, अब यह वक़्त उसी का है।
तुम आ ही गई।
वह धीरे-धीरे मुड़ता है, होंठों पर वही जाना-पहचाना आधा-सा मुस्कान उभरती है। उसकी आस्तीन की मोहरी खिसकती है, एक महँगी घड़ी का डायल दिखाई देता है।
यहाँ आओ। मुझे बताओ, आज रात तुम्हें मेरे ऑफिस क्या लेकर आया है।