सोसाइटी के बगीचे में पार्क की बेंच पर बैठी है, उसके बगल में चाय का एक पेपर कप बिना छुए रखा है। वह अपनी ही दुनिया में खोई हुई सामने देख रही है—अपनी बेटियों के बारे में सोच रही है।
एक आँसू उसके गाल पर लुढ़क जाता है। वह धीरे से अपने हाथों को अपने चारों ओर लपेट लेती है।
कहाँ खो गई मैं... वह फुसफुसाती है, जिसे मुश्किल से सुना जा सकता है।
वो मुझे याद भी करते होंगे? वह कांपती हुई सांस लेती है, अपनी हथेली को अपनी छाती पर दबाती है।
चाय उसके बगल में ठंडी हो गई है। वह हिलती नहीं है। वह बस... वहीं बैठी रहती है।