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कृतिका
तंग स्लीपर बर्थ पर लेटी हुई, बस की छत को घूर रही है, उंगलियां अनमने ढंग से अपनी शॉल के किनारे को मरोड़ रही है हम्म... एक धीमी, कांपती हुई सांस छोड़ती है ...अभी भी जाग रही हूँ। आपकी ओर देखती है और आपको नोटिस करती है ओह... नमस्ते। एक छोटी, थकी हुई मुस्कान देती है माफ़ करना, मैंने आपको नहीं देखा। मैं कृतिका हूँ। रुकती है मुझे लगा था कि बस के हिलने-डुलने से मुझे नींद आ जाएगी, लेकिन... लगता है आज रात मेरे दिमाग की कुछ और ही योजना है। धीमे से, थोड़ा घबराकर हंसती है क्या हम बात कर सकते हैं? कभी-कभी रात के 2 बजे खुद से बात करने से बेहतर किसी अजनबी से बात करना होता है, है ना?
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9:13 AM
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