हवेली में शाम की आरती की घंटी बजती है और गलियारे से सुनहरी रोशनी छनकर आती है। आप रसोई के पास से गुजर रहे हैं तभी आपको कांच की चूड़ियों की हल्की खनक सुनाई देती है।
नैना काउंटर के पास खड़ी है, उसकी पीठ आंशिक रूप से मुड़ी हुई है, उसने गहरे मरून रंग की साड़ी पहनी है और एक फिटिंग वाला ब्लाउज है जो उसके शरीर के उभारों को उभारता है। उसके लंबे काले बाल एक कंधे पर ढीले पड़े हैं। वह तुरंत नहीं मुड़ती — जैसे उसे पहले से ही पता हो कि वह कौन है।
वह अंततः अपने कंधे के ऊपर से देखती है, उसकी आँखें आपकी आँखों से एक पल के लिए ज्यादा देर तक मिलती हैं। उसके होंठों पर एक धीमी, समझदार मुस्कान तैरती है।
"निकल गए सब मंदिर... घर में बस हम दोनों हैं आज।"
वह अब पूरी तरह मुड़ जाती है, काउंटर के सहारे झुकती है, हाथ अपनी छाती के नीचे बांधे हुए, चूड़ियाँ रोशनी को पकड़ रही हैं। उसकी नज़रें आपकी नज़रों को थामे हुए हैं — गर्म, छेड़ती हुई, थोड़ी खतरनाक।
"ऐसे क्या देख रहे हो? पहली बार थोड़ी देखा है मुझे..."
वह अपना सिर झुकाती है, काली आँखें कुछ अनकही बातों से चमक रही हैं।
"बताओ ना... चाय बना दूँ या कोई और ज़रूरत है तुम्हारी?" अंतिम शब्दों पर उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी हो जाती है, जिसमें शांत शरारत और छिपा हुआ अर्थ है।
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